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  • ‘टर्निंग 30’

    फिल्म की कहानी है नैना (गुल पनाग)की जिसकी लाइफ में 30 का पड़ाव पार करते ही कई बदलाव आ जाते हैं|उसका दिल टूट जाता है और दूसरी ओर उसका करियर भी डगमगाने लगता है|फिल्म एक अपरिपक्व महिला के जिम्मेदार बनने की कहानी है|इस दौरान उसकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आते हैं मगर हार न मानते हुए अंततः वह मंजिल पा ही जाती है|

  • नो वन किल्ड जेसिका’

    विवादित जेसिका लाल हत्याकांड पर आने जा रही ‘नो वन किल्ड जेसिका’ के बारे में फिल्म अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने कहा है कि यह मात्र एक मनोरंजक फिल्म है। इस फिल्म में रानी एक पत्रकार की भूमिका में दिखाई देने वाली हैं

  • बदलना होगा भोजपुरी सिनेमा को

    एक अधनंगी लड़की, जिसने पता नहीं किस मजबूरी में अपने विदलन (स्तनों के बीच का भाग) दिखाये होंगे 2. खून से लथपथ हीरो और विलेन (सोचिए, फोटो खिंचवाते समय कितना खून पी जाते होंगे) और नकली बंदूक या चाक़ू… और हां बहुत सारे दूसरे लोग भी दिखेंगे… उन पर ज्यादा ध्यान न भी दें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये जो उच्चतम दर्जे की भोजपुरी फिल्‍में हैं, वो अस्सी के दशक की “सी ग्रेड” हिंदी फिल्‍मों जैसी हैं। हालांकि वो फिल्‍में भी तकनीकी स्तर पर आज की भोजपुरी फिल्‍मों से आगे थीं

  • माइकल जैक्सन ने की थी आत्महत्या

    मशहूर पॉप स्टार माइकल जैक्सन ने एनेथिसिया प्रोपोफोल का जरुरत से ज्यादा डोज लेकर आत्महत्या की थी|डॉक्टर कोनरेड मुरे के वकील ने यह दावा किया है| कोनरेड पर आरोप है कि जैक्सन की हालत बिगड़ने पर जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था तो कोनरेड ने लापरवाही बरती थी जिसकी वजह से जैक्सन की मौत हो गई थी| कोनरेड के वकील ने उनके बचाव में यह बातें लॉस एंजेलस के डिपटी डिस्ट्रिक्ट अटर्नी डेविड वालग्रेन को बताई

  • प्रियंका चोपड़ा बाहर

    अगर आपको लगता है कि शाहरुख़ खान कुछ खास अभिनेत्रियों के साथ काम करना पसंद करते हैं तो आप गलत हैं|अगर किसी अभिनेत्री के साथ शाहरुख़ ने पिछली फिल्म में काम किया है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह उनके साथ आनेवाली फिल्म में भी काम करेंगे|प्रियंका चोपड़ा को शायद शाहरुख़ का तरीका अच्छी तरह से समझ आ गया होगा|

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Thursday, December 30, 2010

'हमारे लिए फ़ादर फ़िगर थे हृषिदा'

News4Nation 11:39 PM


 

 
 
'अभिमान' हृषिदा की अनेक बेहतरीन फ़िल्मों में से एक थी
1973 में आई फ़िल्म 'ज़ंजीर' से मेरी 'एंग्री यंग मैन' वाली छवि बनी लेकिन उससे काफ़ी पहले मैंने हृषिकेश मुखर्जी के साथ किया था.
लेकिन मैंने कभी भी छवि को ध्यान में रखकर काम नहीं किया, मैं प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई के साथ काम कर चुकने के बाद भी हृषिदा के साथ लगातार काम करता रहा.
हृषिदा मेरे और मेरी पत्नी जया के लिए 'फ़ादर फ़िगर' थे, उनके फ़िल्म बनाने का अंदाज़ बिल्कुल अलग था और वे कभी भी क्वालिटी या कथानक से समझौता नहीं करते थे.
वे कभी किसी लीक पर नहीं चले उन्होंने अपना रास्ता ख़ुद तैयार किया जो न तो बहुत व्यावसायिक था और न ही बहुत कला प्रधान.
हृषिदा की कुछ यादगार फ़िल्में
आनंद
मिली
चुपके-चुपके
बेमिसाल
नमक हराम
जुर्माना
सत्यकाम

मुझे यह स्वीकार करना होगा कि अब तक मैंने जितनी भी दिलचस्प भूमिकाएँ की हैं सब उन्हीं की फ़िल्मों में. 'आनंद', 'मिली', 'चुपके-चुपके', 'बेमिसाल', 'नमक हराम' और 'जुर्माना'.
ये सब के सब किरदार बेहतरीन तरीक़े से रचे गए थे और हृषिदा की फ़िल्मों में काम करने पर अभिनय करने का पूरा अवसर मिलता था.
फ़िल्म निर्माण के मामले में उनकी जानकारी इतनी गहरी थी कि हम अपने आप को पूरी तरह उनके हवाले कर देते थे.
हमने कभी स्क्रिप्ट नहीं सुनी, कभी नहीं पूछा कि कहानी क्या है, हम सीधे सेट पर पहुँच जाते थे.
वे हमें बताते थे कि कहाँ खड़ा होना है, क्या बोलना है, कैसे बोलना है, वे सबको अच्छी तरह निर्देश देते थे.
उनकी फ़िल्मों में आप जो हमारा काम देखते हैं उनमें से कुछ भी हमारा नहीं है, सब कुछ हृषिदा का है.
अनूठे निर्देशक
मिली जैसे जटिल चरित्र के मामले में भी वे एक वाक्य में बता देते थे और उसके बाद जब शूटिंग शुरू होती थी तो कलाकारों को निर्देश देते थे.
मैं ख़ुद देख सकता था कि मेरा चरित्र किस तरह से विकसित हो रहा है, मुझे बहुत अच्छा लगता था कि मैंने अपने आप को एक उस्ताद के हवाले कर दिया है. किसी को कोई चिंता करने की ज़रूरत नहीं होती थी सब जानते थे कि हृषिदा उन्हें सही साँचे में ढाल देंगे.
जया को कई फ़िल्मों में हृषिदा का निर्देशन मिला

वे एक बेहतरीन एडिटर थे, वे एक दृश्य का फ़िल्मांकन करते थे तो किसी को तब तक कुछ पता नहीं चलता था जब तक कि उसका संपादन न हो जाए. संपादन के बाद दृश्य को देखकर समझ में आता था कि उन्होंने उस दृश्य की कितनी बेहतरीन कल्पना की थी.
वे फ़िल्म का अंतिम दृश्य सबसे पहले फ़िल्मा सकते थे, उसके बाद बीच के दृश्य और अंत में शुरूआत की शूटिंग, लेकिन जब फ़िल्म एडिट होकर तैयार होती तो पता चलता कि वे कितने प्रतिभाशाली थे.
वे प्रतिभा को पहचानते थे, उसे ललकारते थे, उसका मार्गदर्शन करते थे, हम सब बस उनका अनुसरण करते थे. उनके पात्र और स्थितियाँ सच के बहुत क़रीब होती थीं और कलाकार को पूरा अवसर मिलता था अभिनय कला दिखाने का.
उनकी फ़िल्में बहुत बारीक होती थीं और आगे चलकर कई दूसरे निर्देशकों ने उनका रास्ता अपनाया.
उनकी फ़िल्मों में से किसी एक चरित्र को बेहतरीन बता पाना बहुत कठिन काम है, 'आनंद', 'मिली' और 'अभिमान' के चरित्र मुझे विशेष तौर पर प्रिय हैं. ये तीनों फ़िल्में सिने-निर्माण की दृष्टि से बेहद आनंददायक थीं.
मैंने अगर किसी एक निर्देशक के साथ सबसे अधिक फ़िल्मों में काम किया तो वो हृषिदा ही थे. कुछ लोग ग़लत समझते हैं कि मैंने प्रकाश मेहरा या मनमोहन देसाई की फ़िल्मों में अधिक काम किया है.
यह कहना ग़लत होगा कि वे जिस तरह फ़िल्में बनाते थे वे अब नहीं चलेंगी, मैं पक्के तौर पर जानता हूँ कि अगर हृषिदा फ़िल्म बनाते तो अपने ही ढंग की फ़िल्में बनाते और उन्हें लोग देखते और सराहते.
लता खूबचंदानी से बातचीत पर आधारित
 

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